उत्तर प्रदेश

पत्रकारिता में आने के बाद भी मास्टर साहब बने ही रहे

आजमगढ़ की पत्रकारिता में जो चन्द लोग वास्तविक पत्रकारिता को जीने के लिए आये, उनमें हम लोगों के बीच मास्टर साहब के रूप में अमिट पहचान रखने वाले श्री उमाशंकर सिंह जी भी रहे। आज यह सच जानने के बाद भी यह विश्वास नहीं हो रहा है कि वह हमारे बीच नहीं रहे। आज मैं दिमाग से नहीं बल्कि दिल से यह बात कहता हूं कि, यदि मुझसे यह पूछा जाय कि आजमगढ़ की पत्रकारिता में स्व श्री मुखराम सिंह जी की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कौन आया तो निश्चित रूप से केवल एक नाम आयेगा श्री धीरेन्द्र श्रीवास्तव जी का। और उस परम्परा के सबसे बड़े ध्वजवाहक रहे हैं

हमारे पितातुल्य श्री उमाशंकर सिंह जी और श्री राजेन्द्र सिंह जी। श्री उमाशंकर सिंह जी हम लोगों के साथ पत्रकारिता में उस समय आये जब इस जिले में हिन्दुस्तान अखबार अवतरित हुआ। हमारी क्या बिसात खुद श्री धीरेन्द्र जी और श्री राजेन्द्र जी मास्टर साहब से हमेशा भयभीत रहते थे। हम लोगों की कोशिश यह रहती थी कि हम लोग पान गुटखा खाने जैसा बुरा काम भी मास्टर साहब के सामने न करें। सच तो यह है कि मास्टर साहब सब कुछ जानकर भी अनजान बन जाया करते थे। वह हम लोगों की सारी बुराइयों को यह कहकर नजरअंदाज करके चले जाया करते थे कि जा रहा हूं समय नहीं है।

पत्रकारिता में आये तो हम लोगों ने उनको सबसे उबाउ काम पत्रकारों की कापी जांचने यानि शब्दों की गलती चेक करने का काम दे दिया। वह अच्छे अभिभावक थे, सो परिवार ने जो जिम्मेदारी दी, उसको वह बखूबी निभाये। सच पूछिये तो पत्रकारों की कापी जांचते हुए वह पत्रकारिता में आकर भी मास्टर ही बने ही रहे। हमेशा आपने हमें पुत्रवत स्नेह दिया। कम से कम आपको इस जीवन में नहीं भुला सकेंगे मास्टर साहब। मेरे साथ मेरे समूचे परिवार की ओर से आपको सादर श्रद्धांजलि।

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