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तारीख-दर-तारीख… ऐसे चला अयोध्या विवाद

 

लखनऊ। बहुप्रतीक्षित एवं बहुचर्चित अयोध्या राम जन्मभूमि व बाबरी मस्जिद विवाद पर 40 दिन तक लगातार मैराथन सुनवाई के बाद आखिरकार 9 नवंबर को देश की सबसे बड़ी अदालत की सुप्रीम मुहर लग गई। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने साथ में यह भी आदेश दिया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ जमीन दी जाए। आपको बताते हैं कि तारीखों के आईनें में राजनीतिक रूप से संवेदशील व आस्था से जुड़े अयोध्या मामले में कब-कब क्या हुआ।

साल 1528 में अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं। इसी जगह पर मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया। यह मस्जिद बाबरी मस्जिद के नाम से जानी जाती रही।

साल 1853 में हिंदुओं ने आरोप लगाया कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

साल 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। हिंदू-मुस्लिम दोनों के लिए पूजा की जगह निर्धारित कर दी। जिसमें मुस्लिमों को मस्जिद के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की अनुमति मिली।

पहली बार अदालत की दहलीज पर यह मामला 1885 में पहुंचा। निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने 1885 में फैजाबाद की जिला अदालत में पहली बार अयोध्या में बाबरी मस्जिद के पास ही राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी, लकिन अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी।

23 दिसंबर 1949 को विवादित इमारत के केंद्रीय स्थल पर भगवान राम की मूर्ति का प्राकट्य हुआ। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

साल 1950 में इस मसले पर फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो, साल 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी और फिर साल 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने चौथी अर्जी दाखिल की।

साल 1984 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने विवादित स्थल का ताला खोलने और मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया व समिति का गठन किया।

01 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताला खोला गया। इसके बाद नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

14 अगस्त 1986 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित ढांचे की यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया दिया।

09 नवंबर 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने विवादित स्थल के समीप शिलान्यास की इजाजत दे दी।

30 अक्टूबर 1990 को विहिप के आह्वान पर अयोध्या पहुंचे कारसेवकों ने विवादित ढांचे पर भगवा झंडा फहराया। सुरक्षा बलों की फायरिंग में कई कारसेवक हताहत हुए।

02 नवंबर 1990 को विवादित स्थल की ओर बढ़ते कारसेवकों पर सुरक्षाबलों ने फिर गोलीबारी की।

06 दिसंबर 1992 को हजारों कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचा ढहा दिया। इसके बाद अस्थायी राममंदिर बना। फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया।

साल 1992 में विवादित ढांचे को ढहाने के मामले को लेकर जज एमएस लिब्रहान के नेतृत्व में लिब्रहान आयोग बनाया गया और मामले की जांच शुरू की गई।

साल 1994 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में बाबरी मस्जिद विध्वंस से संबंधित मामला चलना शुरू हुआ।

साल 1997 में विशेष अदालत ने विवादित ढांचे को ढहाए जाने के मामले में 49 लोगों को दोषी करार दिया। इनमें भारतीय जनता पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं के नाम भी शामिल थे।

साल 2001 में विहिप ने राम मंदिर बनाने की तारीख तय की। वीएचपी ने कहा कि मार्च 2002 को अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कराया जाएगा।

जनवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस विवाद को सुलझाने के लिए अयोध्या समिति बनाई।

फरवरी 2002 को भाजपा ने यूपी चुनाव के लिए घोषणा पत्र से राम मंदिर निर्माण का मुद्दा हटा दिया। हालांकि, विहिप ने 15 मार्च से राम मंदिर बनाने की घोषणा कर दी। इसके बाद हजारों हिंदू अयोध्या में एकत्र हो गए। फरवरी में ही गोधरा कांड हो गया जिसमें अयोध्या से लौट रहे 58 कारसेवक मारे गए।

13 मार्च 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी को भी विवादित भूमि पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी।

अप्रैल 2002 को उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू की।

22 जून 2002 को विहिप ने विवादित भूमि पर मंदिर निर्माण की मांग उठाई।

जनवरी 2003 को रेडियो तरंगों के जरिए विवादित स्थल के नीचे किसी प्राचीन इमाररत के अवशेष का पता लगाने कोशिश की गई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

मार्च 2003 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया, जिसे ठुकरा दिया गया।

अप्रैल 2003 को उच्च न्यायालय के आदेश पर पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की जांच के लिए खुदाई शुरू की। पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि विवादित स्थल की खुदाई में मंदिर से मिलते-जुलते कई अवशेष मिले हैं। इस रिपोर्ट ने हिंदू पक्ष के दावे पर मुहर लगा दी थी।

मई 2003 को सीबीआई ने 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत 8 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

जून 2003 को कांची पीठ शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पहल की, लेकिन उनकी कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला।

अगस्त 2003 को विहिप ने राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार से विशेष विधेयक लाने का अनुरोध किया। वीएचपी की इस मांग को तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने ठुकरा दिया।

अप्रैल 2004 को लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या के विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर में पूजा की। इस मौके पर आडवाणी ने कहा कि अयोध्या में मंदिर का निर्माण जरूर किया जाएगा।

जुलाई 2005 को आतंकवादियों ने विस्फोटक से भरी जीप का इस्तेमाल कर विवादित स्थल पर आत्मघाती हमला किया। हालांकि, सुरक्षा बलों ने पांचों आतंकवादियों को मार गिराया।

4 अगस्त 2005 को  फैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए आतंकी हमले में कथित रूप से शामिल 4 लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा।

20 अप्रैल 2006 को  कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने लिब्राहन आयोग को लिखित बयान दिया कि विवादित ढांचे को गिराना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था। इसमें कहा गया कि बीजेपी, आरएसएस, बजरंग दल और शिवसेना ने मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया।

जुलाई 2006 को  सरकार ने विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ शीशे का घेरा लगाने का प्रस्ताव तैयार किया। मुस्लिम पक्ष ने अदालत द्वारा दिए गए स्टे की अवहेलना की बात कहकर इस प्रस्ताव का विरोध किया।

30 जून 2009 को अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस मामले में जां; के लिए बनाए गए लिब्रहान आयोग ने 17 साल बाद अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी।

07 जुलाई 2009 को  उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर बताया कि अयोध्या विवाद से जुड़ीं 23 महत्वपूर्ण फाइलें सचिवालय से गायब हो गई हैं।

24 नवंबर 2009 को  संसद के दोनों सदनों में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश की गई। इसमें विवादित ढांचे को गिराए जाने के वक्त नरसिंह राव को क्लीन चिट दे दी गई।

20 मई 2010 को  विवादित ढांचा विध्वंस मामले में बीजेपी नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत अन्य नेताओं पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।

26 जुलाई 2010 को  अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई।

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में तीन जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांट दिया। इनमें से एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को मिला। फैसले से असंतुष्ट होकर दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

09 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने के फैसले पर रोक लगा दी। इसके साथ ही मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 14 अपीलें दाखिल हुईं।

21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही।

नवंबर 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनना चाहिए, और मस्जिद का निर्माण वहां से दूर किया जाना चाहिए।

फरवरी-जुलाई 2018 तक सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट से मामले पर नियमित सुनवाई करने की अपील की, लेकिन अदालत ने उनकी अपील खारिज कर दी।

29 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जल्द सुनवाई से इनकार करते हुए केस जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई के लिए जनवरी के प्रथम सप्ताह में उचित पीठ का गठन होगा, जो इसकी सुनवाई का कार्यक्रम तय करेगा।

जनवरी 2019 को अयोध्या केस की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों की संवैधानिक पीठ गठित हुई। पीठ में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस बोबडे और जस्टिस एनवी रमन्ना को शामिल किया गया।

10 जनवरी 2019 को मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन द्वारा सवाल उठाए जाने पर जस्टिस यूयू ललित ने खुद को मामले की सुनवाई से अलग किया। राजीव धवन ने कहा था कि 1994 में इसी केस में जस्टिस यूयू ललित ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की अदालत में पैरवी की थी।

27 जनवरी 2019 को जस्टिस बोबडे के छुट्टी पर होने की वजह से 29 जनवरी 2019 की प्रस्तावित सुनवाई टली। सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी 2019 की नई तारीख निर्धारित की।

08 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। अदालत ने पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा। इस पैनल में जस्टिस एफएम खलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और श्रीराम पंचू शामिल थे।

01 अगस्त 2019 को मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। 2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा और इसे मध्यस्थता के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता। 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।

16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस की सुनवाई पुरी की और फैसला सुरक्षित रखा।

09 नवंबर 2019 को अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का दिन आया। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर निर्माण का फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला विराजमान को दी जाए, मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बने और इसकी योजना तैयार की जाए। चीफ जस्टिस ने मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दिए जाने का फैसला सुनाया, जो कि विवादित जमीन की करीब दोगुना है। चीफ जस्टिस ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। इस तरह संविधान पीठ द्वारा 45 मिनट तक पढ़े गए 1045 पन्नों के फैसले ने देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का अंत कर दिया।

 

 

 

 

 

 

 

 

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