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आम और गुटली के दाम एक समान, अँधेरी नगरी गंडू राजा ?


सामान्यतया पेट्रोल और डीजल के दाम के बीच अंतर रहता है। क्यों की पेट्रोल की ज्वलनशीलता डीजल से ज्यादा होती है। अन्य शब्दों में कहे तो पेट्रोल आम तौर पर व्हीकल को ज्यादा ताकत देता है। इसलिए उसके दाम डीजल से ज्यादा होते है। लेकिन देश में शायद यह पहली बार हुवा की पेट्रोल और डीजल के दाम में कुछ पैसों का ही अंतर है। इतना ही नहीं ओडिशा में तो डीजल के दाम पेट्रोल से अधिक हो गए…! पेट्रोल 80.27 के भाव में और डीजल 80.40 के दाम में बिका। सरकार की और आयल कम्पनी की ये किसी निति? एक समय इन दो पदार्थो के दाम के बीच करीब 10 रूपये का अंतर रहता था। लेकिन वर्तमान सरकार ने न जाने कैसा जादू किया की धीरे धीरे ये अंतर कम होता गया। और ओडिशा में तो मानो रिकार्ड दर्ज हो गया। पेट्रोल डीजल दाम को लेकर राजनीति होती आई है। पिछली सरकार पर काफी हलागुल्ला करनेवाले खुद सरकार में आये तब ऐसी बाते करने लगे की लोगो को लगा की ये दो मुह वाली बात है।
आम और गुटली के दाम कभी एक नहीं हो सकते। इसी तरह पेट्रोल और डीजल के दाम भी एक समान नहीं हो सकते। लेकिन ऐसा हो रहा है की आम और आम से निकलनेवाली गुटली के दाम एक समान हो रहे है। कहावत है की अँधेरी नगरी गंडू राजा टेक शेर भाजी टेक शेर खाजा…भाजी और खाजा यानि की मिठाई के दाम एकसमान नहीं हो सकते। लेकिन राजा ही ऐसा था की उसके राज्य में दोनों एक ही दाम में बिकते थे। इसलिए उसे अँधेरी नगरी कही गई है। सरकार में बैठे लोगो को क्या पेट्रोल और डीजल के दाम का पता नहीं होता होंगा? कम से कण पेट्रोलियम मंत्रीजी को मालूमात होता ही होंगा। वे भी हाथ पर हाथ धरे बैठे है और डीजल व्हीकल वाले पेट्रोल से ज्यादा दाम ओडिशा में दे रहे है। ऐसा क्यूँ हो रहा है, सरकारी आयल कम्पनी की भूल है या जानबुछ कर हो रहा है या किसी राज्य में वेट ज्यादा की वजह से हो रहा है उसकी तनिक भी चिंता सरकार में बैठे किसे है ये तो वे ही जाने. लोग बेचारे चिन्तित है की अब क्या होंगा?
कच्चे तेल के भाव को लेकर सरकार अपनी चमड़ी बचाती आई है.लेकिन कब तक इसे जिम्मेवार ठहराने की नाकाम कोशिश होती रहेंगी…? ये सरकारी कंपनियां आखिर क्या मुनाफा कमा कमा कर सरकार को देने के लिए है या जिसका पैसा लगा है उस प्रजा के लिए…? बढती महंगाई, बढते पेट्रोल डीजल के दाम से परेशां है आदमी आम. गरबड आखीर कहाँ है ? दिल्ही में या सरकारी आयल कम्पनी में ? गरबड नहीं तो फिर ऐसा क्यों हो रहा है की आम से महंगी गुटली बिक रही है? किसे फिकर है आम आदमी की? चुनाव के वक्त तो आम आदमी राजा और चुनाव के बाद ? चल बेटे बजा तू बाजा….! ये निति रीति कब तक चलेंगी? लोग परेशान है की आम खाए या गुटली?