देशराजनीति

ईवीएम के प्रबंल विरोध का क्या होगा परिणाम

ईवीएम निर्माता अमेरिका भी अपने यहाॅ चुनाव में बैलेट पेपर का प्रयोग करता है। इलेक्ट्रानिक धोखाधड़ी के किस्से रोजना सामने आते है। ऐसे में अगर भारी भरकम विपक्ष ईवीएम को लेकर लगातार सवाल कर रहा है तो इस पर विचार तो होना ही चाहिए। यह अलग बाॅत है कि हार के बाद हर दल ईवीएम पर उगली उठता है, लेकिन वह अपने आचरण और काम की तरफ नही देखता। देश में बहुमत के साथ आने वाले मोदी सरकार का लम्बा कार्यकाल बीत जाने के बावजूद विपक्ष कई मुद्दों  होने बावजूद महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को घेरने में असफल रहा।

आम आदमी के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों पर वह सरकार को कठघरे में कभी खड़ा नही कर पाया। अब जबकि एक साथ 17 दलों ने ईवीएम पर आरपार की लड़ाई का फैसला लिया है तो इस पर केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्णय लेना ही पड़ेगा भले ही यह निर्णय उपरी मन से लिया जाए। यहाॅ इस बाॅत का जिक्र भी जरूरी है कि आज की तिथि में भाजपा सबसे ज्यादा ताकतवर पार्टी हैं, अगर उसकी नजर में देखा जाए तो वह अपने सदस्यों की संख्या ( कागजों में मन से नही) के आधार पर वह विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है।

इस आधार पर इस ताकतवर पार्टी की सरकार के सामने यह विरोध बौना ही साबित होने वाला है। क्योकि इस आरोप को न तो भाजपा नकार सकती है और न अन्य दल की भारत में सीबीआई को पिजरे में बंद तोता तो चुनाव आयोग को इसी तरह की उपमा दी जा चुकी है ऐसे में विरोध के बाद आयोग कोई बड़ा फैसला करेगा इसकी उम्मीद कम ही लगती है। ईवीएम के विरीध में फिलहाल कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, द्रमुक, जेडीएस, टीडीपी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और सीपीआई-एम, आरजेडी, शिवसेना का रूख स्पष्ट हो चुका है।

जबकि कानून राज्यमंत्री पीपी चैधरी ने 30 जुलाई को ही राज्यसभा में विपक्ष के आरोप खारिज करते हुए कह चुके है कि 2019 के चुनाव ईवीएम से ही होंगे। 2019 होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए विपक्षी दल जहां एक तरफ गठबंधन की कोशिश में जुटे हंै, वहीं उन्होंने ईवीएम के बजाए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी तेज कर दी है। इस सिलसिले में 17 दलों का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही चुनाव आयोग से मुलाकात कर सकता है। बैलेट पेपर से चुनाव कराने की इस मांग में एनडीए का घटक दल शिवसेना भी विपक्षी दलों के साथ आयोग का दरवाजा खटखटा सकती है। इस मुद्दे पर विपक्षी दलों की अगले सप्ताह बैठक होने की उम्मीद है।

कांग्रेस,समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दल बैलेट से चुनाव की मांग कर चुके हैं। बुधवार को तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर समर्थन जुटाने की पहल कर चुकी है। वैसे भी ममता बनर्जी देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर बेहद नाराज है। तृणमूल कांग्रेस नेता डेरक ओ ब्रायन का कहना है कि यह एक ऐसा मामला है, जिस पर सभी विपक्षी दल सहमत हैं और एक साथ खड़े हैं। सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग से मिलकर आगामी लोकसभा चुनाव ईवीएम के बजाए बैलेट पेपर से कराने की मांग करेंगे। बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग में विपक्ष शिवसेना को भी अपने साथ रखना चाहता है। क्योंकि, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग कर चुके हैं।

2014 लोकसभा चुनाव के बाद से ही विपक्ष ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगा रहा है। राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा की जीत के बाद विरोध का यह सुर और तेज हो गया है। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की सफाई के बाद भी विपक्ष संतुष्ट नहीं है।.विपक्षी दलों ने लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में ईवीएम की हैकिंग और री प्रोग्रामिंग किए जाने के आरोप लगा चुका है। जबकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने 2 जून 2018 को कह चुके है कि ईवीएम को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। दलों को हार के लिए किसी न किसी को जिम्मेदार ठहराने की जरूरत होती है। बैलेट पेपर वापस लाने की कोई संभावना नहीं है।

लेकिन अब इस मुद्दे पर एक प्लेटफार्म पर 17 दलों का के आ जाने से ईवीएम का जिन्न एक बार फिर बाहर निकला है। उक्त सभी दल ईवीएम पर आरपार की लडाई के मूड में दिखे, क्योंकि यह 2019 के आम चुनावों की पूर्व बेला है। भाजपा के खिलाफ व्यापक गठबंधन की कोशिशों के बीच देश के 17 राजनीतिक दलों का ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग पर एकजुट होना बड़ी बाॅत है। उम्मीद है ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्तश् की तर्ज पर शिवसेना भी इनके साथ दिखे। ईवीएम का विरोध 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की जबर्दस्त जीत के बाद उठा।जबकि भारत में इसकी पैदाइश के साथ ही आ गया था, जब प्रयोग के तौर पर पहली बार 1982 में एर्नाकुलम के पारावूर के 50 बूथों पर इसका इस्तेमाल हुआ।

ईवीएम में गिनती के बाद कांग्रेस उम्मीदवार एसी जोस भाकपा उम्मीदवार से हार गए। बवाल के बाद न्यायालय के निर्णय पर ईवीएम वाली जगहों पर पुनर्मतदान हुआ और कांग्रेस उतने ही मतो से जीती जितने मतो से हारी थी। यह इस बाॅत पर भी विचार करना होगा कि हमारे देश में ईवीएम मशीनों का उपयोग किया जाता है लेकिन आज भी जापान और अमेरिका जैसे विकसित देशो में चुनाव बेलेट पेपर पर होते है।कुछ समय पहले एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें बीजेपी के बड़े वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बताया कि, ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन जो बनी है उसमें जो माइक्रो कंट्रोलर जो है उसे जापान बनाता है।

’ स्वामी ने बताया कि, ‘मैंने उन जापानीज कम्पनीज से कांटेक्ट किया।स्वामी ने जब जापानी कंपनी से पूछा की हम जो माइक्रो कंट्रोलर हमारे ईवीएम मशीनों में लगाया जाता है क्या वैसा माइक्रो कंट्रोलर आप अपनी ईवीएम मशीनों में भी लगाते हैं? इसके जवाब ने जापानीज कंपनी ने बताया कि, हम कोई पागल थोड़ी है जो ईवीएम मशीनों का उपयोग करेंगे, हम तो बेलेट पेपर ही इस्तेमाल करते है।’ स्वामी ने बताया कि, जब मैंने इसके बारें में हाईकोर्ट में केस डाला तो, हाईकोर्ट ने मुझसे यह सवाल किया कि, ‘क‘या आप कोई ऐसा सुझाव दे सकते है जिससे हम मशीन का भी इस्तेमाल कर सकते है और धांधली भी न हो? इसके जवाब में स्वामी ने जो जवाब दिया वह वाकई काबिलेगौर और तारीफ के लायक है।

इसमें संदेह नहीं कि भारत जैसे विशाल भू-भाग और आबादी वाले देश में ईवीएम अत्यंत मुफीद है। लेकिन जो शंकाए है वो भी निराधार नही। आज अगर कांग्रेस खिलाफ है, तो सत्तारूढ़ भाजपा भी इसका विरोध कर चुकी है। भाजपा आज भले ही इसे विपक्ष की हताशा कहे, मगर ईवीएम का बाकायदा विरोध करने वाली सबसे पहली राजनीतिक पार्टी भाजपा ही थी, जब 2009 आम चुनाव में हार के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने इस पर सवाल उठाए।

अगले ही वर्ष भाजपा नेता और अब पार्टी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने इस पर एक किताब लिखी डेमोक्रेसी ऐट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट ऑवर इलेक्ट्रानिक मशीन? वोटिंग सिस्टम के विशेषज्ञ स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड डिल भी ईवीएम का इस्तेमाल पूरी तरह सुरक्षित न होने की बात कहते हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जब 2009 के चुनावों के बाद ईवीएम से होने वाले ‘होलसेल फ्रॉडश् की आशंका जता रहे थे।

लगभग तभी कांग्रेस ओडिशा में बीजद की जीत का श्रेय ईवीएम को दे रही थी। .अब एकजुट विपक्ष को इस तथ्य के आलोक में भी बहुत कुछ सोचना होगा। उसे अगर 2017 में यूपी की हार याद रहती है, तो बाद के उपचुनावों में अपनी जीत भी याद रखनी होगी, जो उसी ईवीएम से निकली थी। यह विरोध वाकई तर्क-आधारित है या महज असुरक्षा बोध? जब इतने सवाल हों, तो निर्वाचन आयोग को भी इसे एक बार फिर से परख ही लेना चाहिए।

क्योंकि महज इस तर्क से बैलेट पेपर की मांग खारिज नहीं की जा सकती कि यह भारत जैसे विशाल देश की चुनाव प्रक्रिया को बहुत लंबा करने के साथ खर्च भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देगा। लेकिन देश की जनता के मन से आशंकाएं निकालने तो निकालनी ही होगी। आखिर कुछ तो कारण होंगे कि विश्व के विकसित देशों में आज भी बैलट पेपर से ही चुनाव हो रहे हैं। ऐसे में इन 17 दलों के विरोध को सिरे से नकारा नही जा सकता। इस पर आयोग को विचार तो करना ही पड़ेगा भले ही वह बेमन कोई फैसला लेे।

Tags
Show More

Related Articles

Close
Close