क्राइमदेश

बेटा भी चलेगा शहीद पिता की राह

धनबाद: गिरिडीह का पालगंज इलाका। यहीं रहते थे बीएसएफ बटालियन 192 के कांस्टेबल सीताराम उपाध्याय। जम्मू-कश्मीर में सरहद पर तैनात इस जवान ने 17 मई 2018 की रात अरनिया के जाबोवाल में शहादत दे दी। महज 28 वर्ष की उम्र में शहीद होकर इस लाल ने मां भारती का कर्ज अदा दिया। परिवार के साथ गिरिडीह का नाम भी देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखवा गया। उसकी शहादत को पूरे सूबे ने नमन किया। गिरिडीह में जब उसका शव लाया गया तो हर ओर ‘शहीद सीताराम अमर रहे’ का घोष गूंजता रहा था। सीताराम की चाहत थी कि उनका बेटा भी बड़ा होकर देश का सिपाही बना। उनके सपने को साकार करने का प्रण उनके परिवार ने किया है। शहीद की पत्नी रेशमी उपाध्याय ने बताया कि 17 मई 2018 की काली रात कभी न भूल सकूंगी। हमारे जीवन में तो अंधेरा ही छा गया। उनकी आंखें इस दौरान अतीत में खो गई। कहा कि उनको देश सेवा का जुनून था। उनकी जिद, जुनून और कड़ी मेहनत का परिणाम था कि पहले प्रयास में ही बीएसएफ में जगह बना ली।

वे कश्मीर में तैनात थे। रमजान का महीना था। इस पवित्र माह में सरकार ने सीजफायर उल्लंघन के प्रति जवाबी कार्रवाई नहीं करने का फैसला लिया था। दूसरी ओर दुश्मन पाकिस्तान लगातार सीजफायर उल्लंघन कर रहा था। इसी क्रम में उन्हें गोली लगी। पत्नी रेशमी ने बताया कि सीताराम बेहद गरीब परिवार से थे। पिता दिव्यांग और बड़े भाई एक मंदिर में पुजारी हैं। सीताराम ने पढ़ाई के बाद बीएसएफ ज्वाइन की। यह कहकर वह रो उठी। कहा कि बूढ़े मां-बाप की लाठी छिन गई। मेरा सुहाग नहीं रहा। दो बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया। बावजूद हमें गर्व है। अपने बेटे दो वर्षीय कन्हैया को सेना में भेजेंगे। यही उनकी भी इच्छा थी। तीन वर्षीय बिटिया सिद्धि को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना है। सीताराम के पिता ब्रजनंदन उपाध्याय आंखों से देख नहीं पाते हैं। बावजूद उनमें बेटे को खोने के बावजूद गजब का जोश है। दो टूक कहते हैं कि पोता भी सेना में जाएगा और दुश्मनों के छक्के छुड़ाएगा। हम व हमारा परिवार बच्चों को देशभक्ति की ज्वाला से हमेशा आलोकित रखेगा। बच्चों को इस लायक बनाना कि वे भी उस कदम पर चल सकें जिस रास्ते पर उनका पिता चला। वह पथ है देशप्रेम, देशभक्ति।

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