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महाराष्‍ट्र के सियासी ड्रामे में भाजपा ने सरकार भी गंवाई और सहानुभूति भी

शैलेंद्र सिंह

इस साल 24 अक्‍टूबर को महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आए, जिसमें भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा को जहां 105 सीटें तो वहीं, उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिलीं। जबकि एनसीपी 54 और कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई। राज्‍य में बहुमत का जादुई आंकड़ा 146 है, जिससे बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन की सरकार बननी तय मानी जा रही थी। फिर अचानक दोनों पार्टियों के बीच 50-50 फॉर्मूले का जिन्‍न सामने आया और सियासी खलबली मच गई। शिवसेना ने दावा किया कि दोनों के बीच 50-50 फॉर्मूले पर बात हुई थी लेकिन भाजपा ने इससे इनकार किया। अब यहां से शुरू हुआ मौकापरस्‍त सरकार बनाने का राजनीतिक नाटक। शिवसेना, बीजेपी के साथ अपनी बरसों की दोस्‍ती छोड़ते हुए धुर विरोधी विप‍क्षी पार्टियों की गोद में जाकर बैठ गई।

भाजपा द्वारा सरकार गठन का दावा पेश न कर पाने के बाद राज्‍य के राज्‍यपाल ने शिवसेना को राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया लेकिन वह समय रहते दावा पेश नहीं कर पाए। किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा राज्‍य में सरकार बनाने का दावा पेश न कर पाने पर राज्‍यपाल ने राष्‍ट्रपति शासन की अनुशंसा की, जिसे स्‍वीकार करते हुए राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया गया। राज्‍यपाल के इस निर्णय के खिलाफ शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत में सुनवाई चल ही रही थी कि अचानक रातों-रात एनसीपी के नेता अजित दादा पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ आकर सरकार बनाने का दावा पेश किया और राज्‍यपाल ने राष्‍ट्रपति शासन हटाते हुए देवेंद्र फडणवीस को राज्‍य के मुख्‍यमंत्री के पद पर और अजित पवार को उप मुख्‍यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

इनका शपथग्रहण समारोह इसीलिए संभव हुआ क्योंकि अजित पवार बड़ी संख्या में विधायकों को लेकर बीजेपी के साथ आ खड़े हुए। शरद पवार को तो कुछ पता ही नहीं चला कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ लेकिन इसपर यकीन न कर पाने वालों में कांग्रेसी नेता भी शामिल रहे। हालांकि, एनसीपी नेता अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में बहुमत साबित करने के लिए विधायकों को अपने खेमे में लाने में नाकाम रहे। जो एनसीपी विधायक लापता थे, वे भी शरद पवार के खेमे में वापस पहुंच गए। उधर, शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में इस सरकार के गठन को चुनौती दी, जिस पर अदालत ने फडणवीस सरकार को बुधवार (27 नवंबर) को शाम पांच बजे से पहले बहुमत साबित करना का आदेश दिया। कोर्ट का यह आदेश आते ही अजित पवार ने डिप्‍टी सीएम के पद से इस्‍तीफा दे दिया। उसके बाद महज 80 घंटे ही राज्‍य के मुख्‍यमंत्री के पद पर रहे देवेंद्र फडणवीस ने भी इस्‍तीफा दे दिया।

महाराष्ट्र में अचानक बनी फडणवीस सरकार को फ्लोर टेस्‍ट से पहले ही जिस तरह इस्तीफा देने को विवश होना पड़ा, उससे बीजेपी ने सहानुभूति हासिल करने का मौका भी गवां दिया। ऐसा लगता है कि भाजपा ने बिना सोच-विचार किए ही अजित पवार पर भरोसा कर लिया। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि पार्टी सत्ता के लालच में अजित पवार के झांसे में फंस गई। हैरत नहीं कि अजित पवार ने शरद पवार से अलग होने का दिखावा इसीलिए किया हो ताकि भाजपा को न सत्ता मिल सके और न ही सहानुभूति। बात जो भी रही हो लेकिन भाजपा को सरकार गठन के मामले में इतना उतावलापन नहीं दिखाना चाहिए था। आखिर उसने कर्नाटक के अनुभव से कोई सबक क्यों नहीं सीखा? हालांकि, एक साक्षात्‍कार में गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि एनसीपी ने जब पहली बार सरकार बनाने में असमर्थता जताई तो उस पत्र पर भी अजित पवार के ही हस्ताक्षर थे। अब हमारे पास जो समर्थन पत्र आया, उस पर भी अजित पवार के ही हस्ताक्षर थे।

मगर, भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह न करते हुए जिस तरह सरकार बनाई और फिर गंवा दी, उससे पार्टी के विरोधी दलों को खुद को सही साबित करने की आड़ ही मिली। बीजेपी को यह आभास हो तो बेहतर है कि तीन दिन वाली फडणवीस सरकार से वह उपहास का ही पात्र बनी है। अब शिवसेना अपने धुर विरोधी दलों कांग्रेस और एनसीपी से मिलकर कहीं अधिक गाजे-बाजे के साथ सरकार बनाएगी। शिवसेना अपनी और साथ ही लोकतंत्र की जीत के कितने भी दावे करे लेकिन इस यथार्थ को भी कोई नहीं बदल सकता कि महाराष्ट्र की भावी सरकार मौकापरस्ती की राजनीति का शर्मनाक उदाहरण होगी।

राजनीतिक नजरिए से कल तक ये यह माना जाता था कि चुनाव पूर्व गठबंधन मौकापरस्ती की राजनीति पर लगाम लगाने का काम करते हैं लेकिन महाराष्ट्र के सियासी उदाहरण से यह बात स्पष्ट है कि अब वे मौकापरस्ती की राजनीति को बल भी दे सकते हैं। हम यदि चुनाव पूर्व गठबंधन तोड़ने वाले दल शिवसेना की तरह सत्ता हासिल करने लगेंगे तो इससे अनैतिकता की राजनीति और अधिक फले-फूलेगी ही। अगर राजनीतिक दलों को नैतिकता की राजनीति की तनिक भी परवाह है तो उन्हें अनैतिक राजनीति के छिद्रों को बंद करने पर विचार करना होगा।

 

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