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ठाकरे की ‘ठसक’ को खोकर बालासाहेब को श्रद्धाजंलि!


शैलेंद्र सिंह

 

“मैं अगर अकेला भी रह गया न, तो लाखों लोगों को इकट्ठा करने की ताकत आई जगदंबे ने मुझे दी है”… ये डायलॉग फिल्‍मी भले ही हो लेकिन शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब केशव ठाकरे (बाल ठाकरे) के जीवन से प्रेरित जरूर है। बालासाहेब ठाकरे भारतीय राजनीति का वह चेहरा रहे हैं, जिनके इर्द-गिर्द महाराष्ट्र की राजनीति करीब चार दशक तक घूमती रही। बाल ठाकरे ने आज ही के दिन 17 नवंबर, 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। किसी के लिए नायक तो किसी के लिए खलनायक रहे बालासाहेब जब तक जिंदा रहे, अपनी ही शर्तों पर जीते रहे।

23 जनवरी, 1926 को केशव सीताराम ठाकरे के घर जन्मे बाल ठाकरे ने एक पत्रकार और कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। उन्‍होंने ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद 1960 में ‘मार्मिक’ नाम से अपनी खुद की राजनीतिक मैगजीन शुरू की। इस मैगजीन के जरिए बाल ठाकरे ने मुंबई में गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीय लोगों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ मुहिम चलाई। 1966 में उन्‍होंने मुंबई के राजनीतिक और आर्थिक परिदृष्‍य पर महाराष्‍ट्र के लोगों के अधिकार के लिए ‘शिवसेना’ का गठन किया। वामपंथी पार्टियों के खिलाफ खड़ी की गई शिवसेना ने मुंबई में मजदूर आंदोलनों को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई।

1996 में ही पत्नी मीना ठाकरे और बेटे बिंदुमाधव की मौत हो गई फिर भी उन्‍होंने हार नहीं मानी और मजबूती से खड़े रहे। राजनीति में उनका कद बढ़ता गया। साल 1989 में भारतीय राजनीति की दक्षिणपंथी धुरी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना स्वाभाविक दोस्त बनकर उभरीं। आश्‍चर्य की बात नहीं है कि शिवसेना-बीजेपी की सबसे पहली सहयोगी पार्टी बनी। बता दें कि बाल ठाकरे की कांग्रेस से कभी नहीं बनी, लेकिन अब भाजपा से अलग होने के बाद शिवसेना सत्ता के लोभ में जिस तरह कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से मिलकर सरकार बनाने की राह पर बढ़ चली है उससे अवसरवादी राजनीति का शर्मनाक उदाहरण तो पेश हो ही रहा है साथ ही महाराष्‍ट्र में बालासाहेब ठाकरे की जो ‘ठसक’ थी वो भी खोती नज़र आ रही है।

हिंदुत्व की राजनीति का दम भरने वाली और कांग्रेस एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को सदैव कोसने वाली शिवसेना यही साबित कर रही है कि उसे सत्ता चाहिए और इसके लिए वह कुछ भी कर सकती है। बाल ठाकरे द्वारा गठित शिवसेना हिंदुत्ववादी विचारधारा की राजनीति करती है लेकिन कांग्रेस-एनसीपी के साथ उसे कुछ त्याग करना पड़ रहा है। विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव, शिवसेना की तरफ से लगातार वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की गई है लेकिन कांग्रेस-एनसीपी लगातार सावरकर को एक विवादास्पद किरदार मानती रही है। ये पार्टियां उनका नाम महात्मा गांधी की हत्या की साजिश करने वालों के साथ जोड़ती आई हैं। वहीं, बात अगर मुस्लिम आरक्षण की करें तो शिवसेना इस मुद्दे का विरोध करती आई है और राज्य में मराठा आरक्षण को बढ़ावा देने की बात करती आई है, जबकि कांग्रेस-एनसीपी मुस्लिम आरक्षण की बात करती है। ऐसे में अब सभी की नज़र इस बात पर रहेगी कि जिन मुद्दों पर बात अटक रही है वह कैसे पूरे होते हैं और कौन अपने दावे की कुर्बानी देता है।

सेना अपने सत्ता लोभ में खुद को बालासाहेब ठाकरे की विरासत से अलग ही नहीं कर रही है बल्कि उस कांग्रेस के समक्ष नतमस्तक भी हो रही है, जिसके विरोध से ही उसका जन्म हुआ था। ऐसे में शिवसेना को सत्ता तो मिल जाएगी लेकिन क्या उसके नेता खुद से और साथ ही अपने प्रतिबद्ध समर्थकों से आंख मिला पाएंगे? क्या सेना की राजनीति में नीति के लिए कोई जगह नहीं? क्या अब शिवसेना कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के साथ-साथ समान नागरिक संहिता और ऐसे ही अन्य मसलों पर वही सब कुछ बोलेगी जो कांग्रेस और एनसीपी बोलती आ रही हैं?

शिवसेना इस आधार पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हुई क्योंकि भाजपा ने बारी-बारी से दोनों दलों के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने की उसकी मांग नहीं मानी। यह समझ आता है कि सेना इससे कुंठित है कि वह भाजपा के मुकाबले कमजोर हो गई है लेकिन क्या इसका उपाय धुर विरोधी दलों की गोद में बैठना हो सकता है? महाराष्‍ट्र में बालासाहेब केशव ठाकरे का प्रभाव इस कदर था कि बड़े-बड़े दिग्‍गज राजनीतिक बैठकों के लिए उनके निवास स्थान मातोश्री जाया करते थे लेकिन अब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे उस हनक को भुलाकर सत्‍ता के लिए खुद दूसरों के यहां चक्‍कर काट रहे हैं। वैसे तो शिवसेना परिवारवाद की राजनीति का ही पोषण कर रही है लेकिन अब तो वह घोर वंशवादी दल बन रही है। ऐसे में क्‍या शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने पिता बालासाहेब की पुण्‍यतिथि पर ठाकरे परिवार की ‘ठसक’ खोकर उन्‍हें श्रद्धांजलि देंगे, ये एक बड़ा सवाल है।