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सत्ता-संग्राम-आसान नहीं होगा चिराग पासवान के लिए जमुई का चक्रव्यूह तोड़ना

पटना: जमुई की सियासी चाल सीधी नहीं होती है। यहां पर्दे के पीछे से महारथियों के बीच शह-मात का खेल सालों भर जारी रहता है। बैटल फील्ड में कोई और होता है तो बैरकों में कोई और। जमुई में जदयू नेता नरेंद्र सिंह और राजद सांसद जय प्रकाश नारायण के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता दो दशक से जारी है। दोनों के अपने-अपने हित हैं। एक के दो पुत्र हैं तो दूसरे का भाई। इसी चक्रव्यूह में केंद्रीय मंत्री एवं लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान के राजनीतिक वारिस चिराग पासवान फंसे हैं। उनके सामने झंझावातों से निकलने की फिर चुनौती होगी। जरूरी नहीं कि मतदाता पिछले चुनाव की रवायत को बरकरार रखें।

1चिराग को जमुई के दस्तूर का पूरा अहसास है। इसीलिए वह पिता के प्रताप, पहचान और प्रसिद्धि से अलग अपने क्षेत्र में पसीना बहा रहे हैं। जमुई पर नजर तो कांग्रेस को छोड़कर जदयू में नए आए अशोक चौधरी और श्याम रजक की भी है, लेकिन गठबंधन की मजबूरी है। दोनों यहां से किस्मत आजमा चुके हैं। नरेंद्र सिंह की मंशा है कि जमुई में अशोक की जड़ गहरी हो ताकि उनके पुत्रों की राजनीति को दोबारा खाद-पानी मिल सके। किंतु राजग में पासवान की जरूरत और सियासत में कद के आगे ऐसा संभव नहीं है।

चिराग के स्वेच्छा से सीट बदलने के बाद ही दूसरे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। नरेंद्र के बड़े पुत्र अजय प्रताप पिछली बार जमुई से और छोटे पुत्र सुमित चकाई से विधायक रह चुके हैं। अजय अभी भाजपा में हैं और सुमित जदयू में। दावेदारी को लेकर महागठबंधन में ज्यादा महाभारत है। पिछले चुनाव में राजद के टिकट पर सुधांशु शेखर भास्कर को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था।

भास्कर पहले जदयू में थे। सुल्तानगंज से विधायक भी रह चुके हैं। बांका के राजद सांसद जय प्रकाश नारायण क्षेत्र में खुद की अहमियत बनाए रखने के लिए सुधांशु की दावेदारी को अनुकूल मानते हैं। जय प्रकाश के भाई विजय प्रकाश जमुई से विधायक हैं। सुधांशु ने जय प्रकाश के साथ क्षेत्र में घूमना भी शुरू कर दिया है, लेकिन अलौली के युवा विधायक चंदन राम की मंशा पूरी हो गई तो भास्कर के सपने टूट सकते हैं। चंदन को तेज प्रताप ने माथे पर लगा रखा है।

भास्कर और चंदन से अलग एक महारथी और हैं, जो दोनों पर भारी पड़ने की तैयारी में हैं। पिछले चुनाव में जदयू के टिकट पर लड़ चुके उदय नारायण चौधरी ने भले ही पुरानी पार्टी को अलविदा कह दिया है, किंतु जमुई को मुफीद मान रहे हैं। हालांकि लालू प्रसाद के गुडबुक में वह नहीं हैं।

जमुई से बनारसी प्रसाद सिन्हा, नयनतारा दास, भोला मांझी, भूदेव चौधरी और चिराग पासवान लोकसभा जाते रहे हैं। आजादी के पहले कालिका प्रसाद सिंह, गिरिधर नारायण सिंह, श्यामा प्रसाद सिंह, श्रीकृष्ण सिंह, दुखहरण प्रसाद, दुर्गा मंडल और शुक्र दास जैसे नेता सक्रिय थे। गिद्धौर के राजा जयमंगल सिंह को अंग्रेजों ने 1856 में राजा की उपाधि दी थी। 1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया था, जिसके बदले उन्हें 1861 में तीन हजार रुपये वार्षिक मूल्य की लगान मुक्त जागीर मिली थी। जमुई का इतिहास महाभारत के समय से मिलता है।

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