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मेरी फिल्में नहीं चलीं लेकिन तारीफ खूब मिली: सोनाक्षी

करियर की शुरुआत में ‘दबंग’, ‘राउडी राठौर’, ‘सन ऑफ सरदार’ जैसी कमर्शल, हीरो सेंट्रिक फिल्में करने वाली ऐक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा 100 करोड़ी क्लब की फेवरिट हीरोइन थीं। फिर उन्होंने ‘अकीरा’, ‘नूर’, ‘इत्तेफाक’ जैसी लीक से हटकर फिल्में कीं। हिरोइन सेंट्रिक फिल्मों को लेकर सोनाक्षी का मानना है कि दर्शकों को चॉइस देना जरूरी है तभी वह जान पाएंगे कि ये फिल्में भी अच्छी होती हैं।

अपने 8 साल के करियर में ऐक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा ने बॉक्स-ऑफिस पर जोरदार कामयाबी और लगातार असफलता, दोनों का स्वाद चख लिया। एक ओर वह ‘दबंग’, ‘राउडी राठौर’, ‘सन ऑफ सरदार’ जैसी सुपरहिट फिल्मों की हिरोइन बनीं, तो दूसरी ओर ‘नूर’, ‘अकीरा’, ‘इत्तेफाक’ जैसी प्रयोगात्मक फिल्मों का पिट जाना भी देखा। हालांकि, सोनाक्षी का मानना है कि दोनों ही सूरतों में उन्हें फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं हुआ।

सोनाक्षी कहती हैं, ‘अपने करियर की शुरुआत में जो फिल्में मैंने कीं, उनसे मुझे बहुत कुछ मिला। एक तो, मैंने जो सीखा, सेट पर ही सीखा क्योंकि मैंने कोई ऐक्टिंग क्लासेज नहीं ली थी। दूसरे, आज मेरी जो लॉयल ऑडियंस है, वह उन्हीं फिल्मों की वजह से है, जो मैंने अपने करियर के शुरुआत में की थीं। तब लोग थोड़ा-बहुत मजाक उड़ाते थे कि ऐसी फिल्में क्यों कर रही है? रोल कम है, हीरो सेंट्रिक है, लेकिन ऑडियंस बनती कहां से है? इन्हीं फिल्मों से बनती है।

लोग ज्यादा फिल्में कौन सी देखते हैं? यही फिल्में देखते हैं। अब भी जो फैंस मेरी फिल्में देखने जाते हैं, वे इन्हीं फिल्मों से बने हैं। इसीलिए, मुझे लगता है कि मैंने बेस्ट चीज की कि वैसी फिल्मों से शुरुआत की। इन फिल्मों की कामयाबी ने ही मुझे वह आजादी दी, आत्मविश्वास दिया और मेरी एक जगह बना दी कि हां, अब मैं एक फिल्म को अपने कंधे पर उठा सकती हूं। इन फिल्मों ने ही मेरी यह साख बनाई कि मैं टाइटल रोल वाली फिल्में कर पाऊं।

सोनाक्षी ने ‘अकीरा’, ‘नूर’ जैसी टाइटिल रोल वाली फिल्में बेशक कीं, लेकिन ये फिल्में फ्लॉप साबित हुईं। इसका उन पर और उनके करियर पर कितना असर पड़ा? यह पूछने पर वह कहती हैं, ‘जब फिल्म नहीं चलती है, तो निश्चित तौर पर जो भी फिल्म से जुड़ा होता है, उसे दुख तो होता ही है। वह तब कंट्रोल में आता है, जब आपको उस फिल्म के लिए तारीफ मिलती है और मुझे तारीफ बहुत ज्यादा मिली। ‘अकीरा’ के लिए, ‘नूर’ के लिए, ‘लुटेरा’ के लिए। ‘लुटेरा’ भी नहीं चली थी,

लेकिन आज तक लोग मुझसे ‘लुटेरा’ की तारीफ करते हैं। जब तारीफ मिलती है, तो दिल को तसल्ली होती है कि आपने कुछ अच्छा काम किया। ऐसी बहुत सी फिल्में हैं, जो बहुत अच्छी हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलीं। ऐसी बहुत सी फिल्में हैं, जो बहुत ही घटिया हैं, लेकिन बहुत ज्यादा चल जाती हैं। इसीलिए, बॉक्स-ऑफिस कोई मानक नहीं होता, अपने को निराश या खुश करने का।

मैंने सिक्के के दोनों पहलू देखे हैं। जब एक फिल्म बहुत बड़ी हिट होती है, तब भी मैं ज्यादा शोर-शराबा नहीं करती हूं। जब एक फिल्म नहीं चलती है, तब भी मैं उदास नहीं होती हूं क्योंकि मुझे पता है कि मेरे पास काम है। मेरी अगली फिल्म शुरू हो चुकी है। मैं उसमें अपना 100 प्रतिशत लगा रही हूं। मेरी कोशिश रहती है कि अपना काम पूरे दिल से काम करूं। फिल्म का चलना या न चलना ऑडियंस के हाथ में है और जो चीज मेरे हाथ में नहीं है, उससे मैं खुद को परेशान नहीं करती हूं।

फिल्में न चलने पर लोगों के नजरिये में क्या बदलाव आया? इस सवाल पर सोनाक्षी ने कहा, ‘काम के लिहाज से टचवुड कोई फर्क नहीं पड़ा। अब भी जो लोग मेरे साथ काम करना चाहते हैं, वे इसलिए नहीं करना चाहते हैं कि मेरी फिल्में चलती हैं या नहीं चलती है। वे मेरे साथ इसलिए काम करना चाहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मैं एक ऐक्टर के तौर पर उस फिल्म को अपनी परफॉर्मेंस से और बेहतर बना सकती हूं। रही बात ऑडियंस के नजरिए की, तो वह हर फ्राइडे बदलता है।

ठीक है, पिछले फ्राइडे नहीं चली फिल्म, अगले फ्राइडे चल जाएगी, तब उनका नजरिया बदल जाएगा।’ वैसे, सिक्के के दोनों पहलू देखने के बाद उनकी फिल्म चॉइसेस कैसे बदलेंगी? इस पर वह कहती हैं, ‘मैं अब भी दोनों तरह की फिल्में करूंगी। मेरे पास चॉइस है कि मुझे क्या करना है, तो मुझे जिस भी फिल्म में रोल, कहानी और सेट-अप अच्छा लगेगा, मैं वह कर लूंगी।फिल्म ‘हैपी फिर भाग जाएगी’ से जुड़ने के बारे में वह बताती हैं, ‘जब मैंने स्क्रिप्ट सुनी, तो वह मुझे बहुत फनी, बहुत एंटरटेनिंग लगी, तो मैंने हां कर दिया।

मैं यह किरदार इसलिए भी करना चाहती थी क्योंकि हैपी मुझसे बहुत मिलती-जुलती है। मुझमें भी पंजाबियत भरी हुई है। मुझे खाना भी पंजाबी पसंद है। डांस भी पंजाबियों की तरह करती हूं, तो अगर किरदार आपसे मिलता-जुलता हो, तो वह करने में और मजा आता है। फिर, मुझे कॉमिडी फिल्में करना बहुत पसंद है। मैं फैमिली एंटरटेनर करना चाहती हूं, जो मैं इतने साल से करती आ रही हूं, तो मेरे लिए यह बहुत अच्छा अनुभव रहा। सोनाक्षी ने एनबीटी से कहा था कि दर्शक हीरो सेंट्रिक फिल्में देखने आसानी से थिअटर चले जाते हैं, जबकि हिरोइन सेंट्रिक फिल्में देखने कम जाते हैं,

इस सोच में अब कोई बदलाव देखती हैं? यह पूछने पर उन्होंने कहा, ‘हां, पिछले 2 सालों में यह सोच बदली है, क्योंकि अब ऐसी बहुत सारी फिल्में बनने लगी हैं। जैसे, अगर एक बच्चे को आप लॉलिपॉप नहीं देंगे, तो उसे पता नहीं होगा कि लॉलिपॉप होता क्या है! वह केक ही खाता रहेगा। जब आप उसे दोनों का चॉइस देंगे, तब उसे लगेगा कि अच्छा यह चीज भी अच्छी है। यही बात ऑडियंस के साथ भी है। आप उन्हें फीमेल सेंट्रिक फिल्में देंगे, तब वे उसे ऐक्सेप्ट करेंगे। यह हमारे लिए अच्छा है।

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