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निर्भया के दोषी को याद आए वेद पुराण, फांसी से बचने के लिए दी ये दलीलें


निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में फांसी की सजा पाए अक्षय कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका में वेद पुराणों का जिक्र करते हुए जो तर्क दिए हैं, उसे अगर वह वारदात को अंजाम देते समय याद रखता तो शायद यह दिल दहला देने वाली घटना नहीं घटती।

अक्षय ने अपनी याचिका में कहा, सरकार को सिर्फ यह साबित करने के लिए लोगों को फांसी नहीं देनी चाहिए कि वह आतंकी या महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अपराध में शामिल है। उसे बदलाव के लिए सुनियोजित तरीके से सुधार के लिए काम करना चाहिए। फांसी से सिर्फ अपराधी मरता है, अपराध नहीं। मौत की सजा बेरहमी से हत्या है और यह दोषियों को सुधरने का अवसर प्रदान नहीं करती।

याचिका में पूर्व चीफ जस्टिस पीएन भगवती की टिप्पणी का जिक्र किया गया है कि गरीब पृष्ठभूमि वाले अधिकांश दोषियों को फांसी के फंदे तक भेजने की संभावना अधिक रहती है। अगर हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली कानूनी मानकों के तर्कसंगत आवेदन की गारंटी नहीं ले सकती, तो हम कैसे न्यायपालिका को यह अधिकार दे सकते हैं कि किसे जीना चाहिए और किसे नहीं।

अक्षय ने याचिका में वेद पुराणों का हवाला देते हुए कहा, मौत की सजा क्यों? जब मनुष्य की आयु कम हो रही है। हमारे वेद, पुराण और उपनिषदों में कहा गया है कि सतयुग में मनुष्य हजार साल जीता था। द्वापर में सौ साल, लेकिन कलयुग में नहीं। इस युग में मनुष्य की उम्र 50-60 साल ही रह गई है। बहुत ही कम सुनते हैं कि कोई 100 साल जिया।

जब हम अपने आसपास देखते हैं तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जब एक व्यक्ति जीवन की कड़वी सच्चाई का सामना करता है और विपरीत परिस्थिति से गुजरता से है तो वह किसी जिंदा लाश की तरह ही होता है। गांधी जी हमेशा कहते थे कि कोई भी फैसला लेने से पहले सबसे गरीब व्यक्ति के बारे में सोचें। यह सोचें कि आखिर आपका फैसला कैसे उस व्यक्ति की मदद करेगा। आप ऐसा विचार करेंगे तो आपके भ्रम दूर हो जाएंगे।

दोषियों ने दक्षिणी दिल्ली में 16-17 दिसंबर, 2012 की रात चलती बस में 23 वर्षीय छात्रा के साथ दरिंदगी की हदें पार कर दी थीं। सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसे बुरी तरह जख्मी करके के सड़क पर फेंक दिया था। निर्भया का बाद में 29 दिसंबर, 2012 को सिंगापुर में माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल में निधन हो गया था।